कोरोना से लड़ने की हर्ड इम्युनिटी 60% से घटकर 43% हो सकती है क्योंकि लोग मिलने-जुलने से खुद को नहीं रोक रहे

कोरोना से लड़ने की हर्ड इम्युनिटी 60% से घटकर 43% हो सकती है क्योंकि लोग मिलने-जुलने से खुद को नहीं रोक रहे

  • ब्रिटेन की नॉटिंग्घम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा, आबादी में जितना ज्यादा संक्रमण फैलेगा, हर्ड इम्युनिटी का स्तर घटेगा
  • शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब बड़े समूह में किसी बीमारी से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी हर्ड इम्युनिटी विकसित हो जाती है तो संक्रमण की कड़ी टूटने लगती है

दैनिक भास्कर

Jun 26, 2020, 05:58 AM IST

ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने हर्ड इम्युनिटी पर नया दावा पेश किया है। उनका कहना है कि कोरोना से लड़ने में लोगों की हर्ड इम्युनिटी का स्तर जितना पहले सोचा गया था, यह उससे भी नीचे गिर सकता है। यानी लोगों के समूह में रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है। हर्ड इम्युनिटी का मतलब होता है एक पूरे झुंड या आबादी की बीमारियों से लड़ने की सामूहिक रोग प्रतिरोधकता पैदा हो जाना। जैसे चेचक, खसरा और पोलियो के खिलाफ लोगों में हर्ड इम्युनिटी विकसित हुई थी।

हर्ड इम्युनिटी गिरने का कारण लोगों को मिलना-जुलना
रिसर्च करने वाली नॉटिंग्घम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फ्रैंक बॉल के मुताबिक, इम्युनिटी के लिए आबादी में मौजूद हर एक इंसान को वैक्सीन लगना जरूरी है। रिसर्च के दौरान सामने आया कि हर्ड इम्युनिटी गिरने का स्तर लोगों की एक्टिविटी है न कि उनकी उम्र। महामारी के दौरान भी लोग एक-दूसरे से मिल रहे हैं, इसलिए इन्हें संक्रमित होने का खतरा ज्यादा है। इस तरह आबादी में जितना ज्यादा संक्रमण फैलेगा हर्ड इम्युनिटी का स्तर घटेगा। 

अलग-अलग उम्र के लोगों और उनकी गतिविधि का विश्लेषण किया गया
शोधकर्ताओं का कहना है कि वैक्सीन लगने के बाद जब धीरे-धीरे बड़े समूह में किसी बीमारी से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है तो संक्रमण की कड़ी टूटने लगती है। 

लोगों के समूहों में हर्ड इम्युनिटी घटेगी या बढ़ेगी, इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं एक मैथमेटिकल मॉडल का इस्तेमाल किया। इसमें अलग-अलग उम्र के लोग और उनकी सामाजिक गतिविधि वाले लोगों को शामिल किया गया। रिसर्च में पाया गया कि लोगों में हर्ड इम्युनिटी का स्तर 60 से घटकर 43 फीसदी तक जा सकता है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 के संक्रमण की स्थिति देखकर 60 से 85 प्रतिशत आबादी में प्रतिरक्षा आने के बाद ही हर्ड इम्युनिटी बनने का दावा किया जा सकता है। पुरानी बीमारी डिप्थीरिया में हर्ड इम्युनिटी का आंकड़ा 75 प्रतिशत, पोलियो में 85 प्रतिशत और खसरा में करीब 95 प्रतिशत है।

four पॉइंट : ऐसे समझें हर्ड इम्युनिटी का फंडा

  • हर्ड इम्युनिटी में हर्ड शब्द का मतलब झुंड से है और इम्युनिटी यानी बीमारियों से लड़ने की क्षमता। इस तरह हर्ड इम्युनिटी का मतलब हुआ कि एक पूरे झुंड या आबादी की बीमारियों से लड़ने की सामूहिक रोग प्रतिरोधकता पैदा हो जाना। 
  • वैज्ञानिक सिद्धांत के मुताबिक, अगर कोई बीमारी किसी समूह के बड़े हिस्से में फैल जाती है तो इंसान की इम्युनिटी उस बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है। इस दौरान जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं। यानी उनमें प्रतिरक्षा के गुण पैदा हो जाते हैं। इसके बाद झुंड के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है। इसे ही ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहा जा रहा है। 
  • हर्ड इम्युनिटी महामारियों के इलाज का एक पुराना तरीका है। व्यवहारिक तौर पर इसमें बड़ी आबादी का नियमित वैक्सिनेशन होता है, जिससे लोगों के शरीर में प्रतिरक्षी एंटीबॉडीज बन जाती हैं। जैसा चेचक, खसरा और पोलियो के साथ हुआ। दुनियाभर में लोगों को इनकी वैक्सीन दी गई और ये रोग अब लगभग खत्म हो गए हैं।
  • वैज्ञानिकों का ही अनुमान है कि किसी देश की आबादी में कोविड-19 महामारी के खिलाफ हर्ड इम्युनिटी तभी विकसित हो सकती है, जब कोरोनावायरस उसकी करीब 60 प्रतिशत आबादी को संक्रमित कर चुका हो। वे मरीज अपने शरीर में उसके खिलाफ एंटीबॉडीज बनाकर और उससे लड़कर इम्यून हो गए हों।

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